क्या आप जानते है RERA एक्ट के आ जाने से बायर को मिलने वाले फायदों के बारे में ?

इंसान जब घर खरीदता है तो अपने जीवन की सारी जमा पूंजी उस एक जगह लगा देता है। और ऐसे में पैसे और घर की सिक्योरिटी को लेकर मन में डर उठना जायस भी है। मगर RERA के आ जाने की वजह से खरीदारों का ये डर अब पूरी तरह ख़त्म हो गया है। आइए सबसे पहले जानते है की आख़िर ये RERA है क्या?

RERA यानी की रियल एस्टेट रेगुलेटरी एक्ट, 2016 में गवर्मेंट से पास किया गया एक ऐसा एक्ट है जो प्रॉपर्टी बिल्डर, प्रॉपर्टी बायर और रियल एस्टेट एजेंट के बीच की सारी शंका को खत्म करने का काम करता है। RERA को इस तरह भी समझा जा सकता है की ये एक्ट घर खरीदने के पहले दोनों, तीनों पार्टीज के बीच भरोसे की नींव का काम करता है। RERA के आ जाने की वजह से रियल एस्टेट सेक्टर में कई तरह के चेंजेज हुए है। आइए जानते है उन बदलावों के बारे में।

RERA के आ जाने की वजह से प्रॉपर्टी की कॉस्ट अब और ज्यादा ट्रांसपेरेंट हो गई है। बिल्डर्स पहले अपने कस्टमर्स को प्रॉपर्टी की कीमत बिल्ट अप एरिया के हिसाब से लगाते थे, जिसकी वजह से कस्टमर को कई बार समझ नहीं आता था की वो किस फैसिलिटी के लिए कितना पे कर रहा है। मगर अब ऐसा नहीं है। अब RERA के तहत बिल्डर्स को प्रॉपर्टी की कॉस्ट कार्पेट एरिया के अकॉर्डिंग लगानी होगी, जिससे बायर को कॉस्ट बेहतर तरह से समझ आए।

जब कोई बिल्डर अपार्टमेंट बनाता है, तब वो अपने कस्टमर से घर की कीमत के साथ साथ पार्किंग चार्ज भी अलग से लेता है। ये चार्ज 2 लाख से 6 लाख के बीच में रहता है जिसकी कीमत प्रॉपर्टी साइज़ और एरिया पर डिपेंड करती है। मगर RERA एक्ट के तहत अब बिल्डर्स को प्रॉपर्टी चार्जेस भी सेल्स एग्रीमेंट में अलग से और ट्रांसपेरेंटली मेंशन करना होगा।

RERA के आ जाने की वजह से अब मार्केट में फ्रॉड रियल एस्टेट एजेंट्स की दुकानें भी बंद हो गई है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि इस एक्ट में सभी रियल एस्टेट एजेंट्स को अपने आप को गवर्मेंट से रजिस्टर कराना होगा। जब तक कोई एजेंट ऑथराइज्ड नहीं है, तब तक वो रियल एस्टेट सेक्टर में काम नहीं कर सकता। इस तरह RERA एक्ट बायर को धोखा खाने से बचाता है।

साथ ही इससे एक फायदा ये भी है की अब बिल्डर्स कस्टमर्स को घर देने में देरी नहीं कर सकते। अगर उन्होनें की गई तारीख़ तक घर या प्रॉपर्टी रेडी नहीं की तो उन्हें पैनल्टी या 3 साल की सज़ा हो सकती है। साथ ही अगर बायर प्रॉपर्टी के साथ सैटिस्फाइड नहीं है तो वो 15 दिन के अंदर क्लेम कर अमाउंट रिफंड करवा सकता है।

अक्सर ऐसा भी होता है की बायर को घर में शिफ्ट होने के बाद कंस्ट्रक्शन या स्ट्रक्चरल डिफेक्ट का सामना करना पड़ता है। और ऐस केस में जब वो बिल्डर से उसकी कंप्लेन करता है तो बिल्डर इसका ज़िम्मा अपने सर नहीं लेता है। मगर अब RERA के आ जाने के बाद से प्रॉपर्टी बनने के 5 साल बाद तक किसी भी तरह से स्ट्रक्चरल डिफेक्ट के लिए ख़ुद बिल्डर ज़िम्मेदार होगा। 

RERA के तहत एक स्टेट लेवल रेगुलेटरी बॉडी बनाई जाएगी जो रियल एस्टेट के मुद्दो से जुड़ी कंप्लेन, लड़ाई, मसलों को सॉल्व करेगी। इस रेगुलेटरी बॉडी में हाई कोर्ट के जज, स्टेट के लॉ सेक्रेटरी और स्टेट के हाउसिंग सेक्रेटरी शामिल होंगे।

मगर जब बदलाव होते है, तो उनसे हमेशा फायदा हो ये ज़रूरी तो नहीं। RERA के आ जाने की वजह से रियल एस्टेट में जो एक नुकसान हुआ है वो है डेवलपर के लिए कंप्लायंस कास्ट का बढ़ जाना। डेवलपर को अब उनके प्रोजेक्ट्स प्रॉपर अथॉरिटी के साथ रजिस्टर करवाने होंगे, और साथ ही समय समय पर उस प्रॉजेक्ट की प्रोसेस रिपोर्ट भी देनी होगी। जिसकी वजह से प्रॉपर्टी कॉस्ट में कुछ परसेंट की बढ़ोतरी हुई है।

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